सप्तश्लोकी दुर्गा स्तोत्रम् (Saptashloki Durga Stotra)
36 Visited Stotras • Updated: Tuesday, 26 August 2025

सप्तश्लोकी दुर्गा स्तोत्रम् (Saptashloki Durga Stotra)
सप्तश्लोकी दुर्गा स्तोत्रम् (सप्तश्लोकी दुर्गा स्तोत्र) एक अत्यंत पवित्र और शक्तिशाली स्तोत्र है, जो देवी दुर्गा की स्तुति के लिए समर्पित है। यह स्तोत्र सात श्लोकों में विभाजित है, जो देवी की महिमा और उनके अनुग्रह की कामना करते हैं।
महत्व:
- यह स्तोत्र भक्तों को शक्ति, साहस और सुरक्षा प्रदान करने के लिए माना जाता है।
- यह स्तोत्र जीवन की कठिनाइयों और चुनौतियों का सामना करने में मदद करता है।
- यह स्तोत्र शांति, समृद्धि और आध्यात्मिक विकास की कामना करता है।
सात श्लोक:
सप्तश्लोकी दुर्गा स्तोत्र में निम्नलिखित सात श्लोक हैं:
१. शरणागत दीनार्त परित्राण परायणे…
२. सर्वस्यार्तिहरे देवि…
३. सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये…
४. सर्वाबाधा प्रशमनं…
५. सर्वस्वरूपे सर्वेशे…
६. दुर्गे स्मृता हरसि…
७. सर्वाबाधा विनिर्मुक्तो…
पाठ के लाभ:
सप्तश्लोकी दुर्गा स्तोत्र का पाठ करने से निम्नलिखित लाभ हो सकते हैं:
- नकारात्मक ऊर्जाओं से सुरक्षा
- जीवन की कठिनाइयों में साहस और शक्ति
- शांति और समृद्धि की प्राप्ति
- आध्यात्मिक विकास और आत्म-साक्षात्कार
कब पढ़ें:
सप्तश्लोकी दुर्गा स्तोत्र का पाठ किसी भी समय किया जा सकता है, लेकिन यह विशेष रूप से लाभकारी होता है:
- नवरात्रि के दौरान, जो देवी दुर्गा को समर्पित एक नौ-दिवसीय त्योहार है।
- मंगलवार और शुक्रवार को, जो देवी की पूजा के लिए शुभ दिन माने जाते हैं।
- जीवन की कठिनाइयों और चुनौतियों के समय, जब देवी की सुरक्षा और मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है।
॥ अथ सप्तश्लोकी दुर्गा ॥
शिव उवाच:
देवि त्वं भक्तसुलभे सर्वकार्यविधायिनी ।
कलौ हि कार्यसिद्ध्यर्थमुपायं ब्रूहि यत्नतः ॥देव्युवाच:
शृणु देव प्रवक्ष्यामि कलौ सर्वेष्टसाधनम् ।
मया तवैव स्नेहेनाप्यम्बास्तुतिः प्रकाश्यते ॥
विनियोग:
ॐ अस्य श्री दुर्गासप्तश्लोकीस्तोत्रमन्त्रस्य नारायण ऋषिः, अनुष्टुप छन्दः, श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वत्यो देवताः, श्रीदुर्गाप्रीत्यर्थं सप्तश्लोकीदुर्गापाठे विनियोगः ।
ॐ ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हिसा ।
बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति ॥1॥
दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः
स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि ।
दारिद्र्यदुःखभयहारिणि त्वदन्या
सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता ॥2॥
सर्वमंगलमंगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके ।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तुते ॥3॥
शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणे ।
सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणि नमोऽस्तुते ॥4॥
सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्तिसमन्विते ।
भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमोऽस्तुते ॥5॥
रोगानशोषानपहंसि तुष्टा रूष्टा
तु कामान् सकलानभीष्टान् ।
त्वामाश्रितानां न विपन्नराणां
त्वामाश्रिता ह्माश्रयतां प्रयान्ति ॥6॥
सर्वाबाधाप्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्र्वरि ।
एवमेव त्वया कार्यमस्यद्वैरिविनाशनम् ॥7॥
॥ इति श्रीसप्तश्लोकी दुर्गा संपूर्णम् ॥
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