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पुत्रदा एकादशी: व्रत, कथा, पूजा विधि, महत्व और धार्मिक मान्यता

पुत्रदा एकादशी: व्रत, कथा, पूजा विधि, महत्व और धार्मिक मान्यता

पुत्रदा एकादशी: व्रत, कथा, पूजा विधि, महत्व और धार्मिक मान्यता

161 Visited Ekadashi Dates & List • Updated: Saturday, 22 August 2026

पुत्रदा एकादशी: व्रत, कथा, पूजा विधि, महत्व और धार्मिक मान्यता


पुत्रदा एकादशी हिंदू धर्म में भगवान विष्णु को समर्पित अत्यंत महत्वपूर्ण एकादशी व्रतों में मानी जाती है। श्रावण मास के शुक्ल पक्ष में आने वाली एकादशी को श्रावण पुत्रदा एकादशी कहा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस व्रत का संबंध संतान सुख, परिवार की समृद्धि और भगवान विष्णु की कृपा से है।

हिंदू पंचांग के अनुसार सामान्यतः वर्ष में 24 एकादशियाँ आती हैं। अधिकमास अर्थात पुरुषोत्तम मास की स्थिति में दो अतिरिक्त एकादशियाँ होने से इनकी संख्या 26 हो जाती है। प्रत्येक एकादशी का अपना अलग धार्मिक महत्व और कथा है।

पुत्रदा एकादशी की कथा में राजा महीजित, लोमश ऋषि और उनके पूर्व जन्म के कर्मों का वर्णन मिलता है। यह कथा केवल संतान प्राप्ति की धार्मिक कामना तक सीमित नहीं है, बल्कि कर्म, प्रायश्चित, दया, संयम और परोपकार का भी संदेश देती है।

ध्यान दें: पुत्रदा एकादशी की कथा और इसके फल से संबंधित बातें धार्मिक ग्रंथों और लोक-परंपराओं में वर्णित आस्थागत मान्यताएँ हैं। इन्हें वैज्ञानिक रूप से सिद्ध चिकित्सकीय उपचार या संतान प्राप्ति की गारंटी के रूप में नहीं लेना चाहिए।

पुत्रदा एकादशी का अर्थ क्या है?

‘पुत्रदा’ शब्द संस्कृत के दो शब्दों से बना है—पुत्र + दा, अर्थात पुत्र या संतान प्रदान करने वाली।

धार्मिक परंपरा में इस एकादशी को विशेष रूप से उन दंपतियों के लिए महत्वपूर्ण माना गया है जो संतान सुख की कामना रखते हैं। हालांकि आधुनिक संदर्भ में ‘पुत्रदा’ का अर्थ केवल पुत्र प्राप्ति तक सीमित न रखकर संतान सुख और स्वस्थ पारिवारिक जीवन की कामना के व्यापक अर्थ में समझना अधिक उपयुक्त है।

पुत्रदा एकादशी कब आती है?

पुत्रदा एकादशी वर्ष में दो बार आती है—

  1. पौष शुक्ल एकादशी
  2. श्रावण शुक्ल एकादशी

यहाँ वर्णित कथा श्रावण शुक्ल पुत्रदा एकादशी की है।

तिथि और पारण का सही समय हर वर्ष स्थान और पंचांग के अनुसार बदल सकता है। इसलिए व्रत रखने वाले व्यक्ति को अपने क्षेत्र के स्थानीय पंचांग के अनुसार एकादशी तिथि, द्वादशी पारण और हरिवासर आदि का समय देखना चाहिए।


पुत्रदा एकादशी की पौराणिक कथा

द्वापर युग के आरंभ की बात है। महिष्मति नाम की एक नगरी थी। वहाँ राजा महीजित राज्य करते थे।

राजा अत्यंत धर्मात्मा और न्यायप्रिय थे। वे अपनी प्रजा की देखभाल पुत्र के समान करते थे। राज्य में धर्म और न्याय का पालन होता था और राजा किसी के साथ भेदभाव नहीं करते थे।

लेकिन राजा के जीवन में एक बड़ा दुःख था—वे पुत्रहीन थे।

राजा ने संतान प्राप्ति के लिए अनेक उपाय किए, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली। जैसे-जैसे उनकी आयु बढ़ती गई, उनका दुःख भी बढ़ता गया।

एक दिन राजा ने अपने मंत्रियों और प्रजा के प्रतिनिधियों को बुलाकर अपनी व्यथा सुनाई।

राजा ने कहा—

“मैंने कभी अन्यायपूर्वक धन अर्जित नहीं किया। मैंने देवताओं, ब्राह्मणों या किसी अन्य व्यक्ति की संपत्ति नहीं छीनी। मैंने अपनी प्रजा का पालन अपने पुत्रों की तरह किया है। अपराधियों को भी दंड देते समय मैंने न्याय का पालन किया है। फिर भी मेरे जीवन में संतान का सुख क्यों नहीं है?”

राजा की यह बात सुनकर मंत्री और प्रजा के प्रतिनिधि भी चिंतित हो गए।

उन्होंने राजा की समस्या का समाधान खोजने का निश्चय किया।


लोमश ऋषि से हुई भेंट

राजा की समस्या का समाधान खोजने के लिए मंत्री और प्रजा के प्रतिनिधि वन की ओर निकल पड़े। वहाँ उन्होंने अनेक ऋषि-मुनियों के आश्रमों में जाकर मार्गदर्शन प्राप्त करने का प्रयास किया।

इसी क्रम में उन्हें एक अत्यंत तपस्वी और ज्ञानी ऋषि के दर्शन हुए। उनका नाम था लोमश ऋषि

पौराणिक वर्णन में लोमश ऋषि को अत्यंत दीर्घायु, तपस्वी, जितेंद्रिय और शास्त्रों का महान ज्ञाता बताया गया है। कहा जाता है कि कल्प बीतने पर उनके शरीर का एक रोम गिरता था।

मंत्री और प्रजा के प्रतिनिधियों ने ऋषि को प्रणाम किया।

लोमश ऋषि ने पूछा—

“आप लोग किस उद्देश्य से यहाँ आए हैं?”

सबने राजा महीजित की समस्या उन्हें बताई।

उन्होंने कहा—

“हमारा राजा धर्मपूर्वक राज्य करता है। वह प्रजा को अपनी संतान के समान मानता है। फिर भी वह संतानहीन है। उसके दुःख से पूरी प्रजा दुःखी है। कृपया ऐसा उपाय बताइए जिससे राजा को संतान सुख प्राप्त हो सके।”

ऋषि ने कुछ समय ध्यान किया और फिर राजा के पूर्व जन्म का वृत्तांत बताया।


राजा महीजित के पूर्व जन्म का रहस्य

लोमश ऋषि ने बताया कि राजा महीजित अपने पूर्व जन्म में एक निर्धन वैश्य था।

जीवन-निर्वाह के लिए वह एक स्थान से दूसरे स्थान पर व्यापार करने जाया करता था।

एक बार वह ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी के दिन एक जलाशय के पास पहुँचा।

वह कई समय से भूखा-प्यासा था। जलाशय पर उसने एक प्यासी गाय को पानी पीते देखा।

कथा के अनुसार उस समय उसने उस गाय को पानी पीने से हटाकर स्वयं पानी पी लिया।

लोमश ऋषि ने बताया कि उसी कर्म के कारण उसे अगले जन्म में राजा तो मिला, लेकिन संतान सुख से वंचित रहने का दुःख प्राप्त हुआ।

यहाँ कथा कर्म के एक महत्वपूर्ण सिद्धांत की ओर संकेत करती है—मनुष्य के छोटे-बड़े कर्मों का प्रभाव उसके जीवन पर पड़ सकता है और इसलिए जीवों के प्रति दया तथा करुणा का व्यवहार आवश्यक है।


प्रजा ने पूछा—पाप का प्रायश्चित कैसे होगा?

राजा के पूर्व जन्म की बात सुनकर मंत्री और प्रजा के प्रतिनिधियों ने ऋषि से पूछा—

“यदि राजा के इस कर्म के कारण उसे संतान सुख नहीं मिल रहा है, तो इसका प्रायश्चित क्या है?”

लोमश ऋषि ने उन्हें श्रावण शुक्ल एकादशी का व्रत करने की सलाह दी।

उन्होंने कहा कि इस एकादशी को पुत्रदा एकादशी कहा जाता है।

यदि राजा की प्रजा श्रद्धापूर्वक इस व्रत को करे, भगवान विष्णु की पूजा करे और रात्रि में जागरण करे, तो उस व्रत का पुण्य राजा को समर्पित किया जा सकता है।

ऋषि के निर्देश के अनुसार सभी लोग वापस महिष्मति नगरी लौट आए।


पुत्रदा एकादशी का व्रत

जब श्रावण शुक्ल एकादशी आई, तब राजा की प्रजा ने श्रद्धा और भक्ति के साथ पुत्रदा एकादशी का व्रत रखा।

दिनभर भगवान विष्णु का स्मरण किया गया और रात्रि में जागरण करके भगवान की आराधना की गई।

द्वादशी के दिन व्रत का पारण किया गया और कथा के अनुसार व्रत से प्राप्त पुण्य राजा महीजित को समर्पित किया गया।

धार्मिक कथा के अनुसार इस पुण्य के प्रभाव से राजा की रानी ने गर्भ धारण किया।

समय आने पर उनके यहाँ एक तेजस्वी पुत्र का जन्म हुआ।

राजा और पूरी प्रजा अत्यंत प्रसन्न हुई।

इसी कारण श्रावण शुक्ल एकादशी को पुत्रदा एकादशी कहा गया।


पुत्रदा एकादशी की धार्मिक महिमा

पौराणिक मान्यता के अनुसार पुत्रदा एकादशी का व्रत करने और इसकी कथा सुनने से व्यक्ति को अनेक आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होते हैं।

धार्मिक ग्रंथों में इसके प्रमुख फल इस प्रकार बताए गए हैं—

  • संतान सुख की कामना पूर्ण होने की धार्मिक मान्यता।
  • भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होने की आस्था।
  • पापों से मुक्ति और प्रायश्चित का भाव।
  • परिवार में सुख-शांति की कामना।
  • मन और इंद्रियों पर नियंत्रण।
  • भगवान के प्रति भक्ति और श्रद्धा में वृद्धि।
  • व्रत, संयम और सात्त्विक जीवन की प्रेरणा।
  • कथा श्रवण से पुण्य प्राप्त होने की धार्मिक मान्यता।

कथा में यह भी कहा गया है कि पुत्रदा एकादशी का माहात्म्य सुनने मात्र से वाजपेय यज्ञ के समान फल प्राप्त होता है।

यह एक धार्मिक मान्यता है और इसे आध्यात्मिक संदर्भ में ही समझना चाहिए।


पुत्रदा एकादशी की पूजा विधि

पुत्रदा एकादशी के दिन श्रद्धालु भगवान विष्णु की पूजा करते हैं। अलग-अलग क्षेत्रों और संप्रदायों में पूजा की विधि में कुछ अंतर हो सकता है।

सामान्य रूप से पूजा की प्रक्रिया इस प्रकार रखी जा सकती है।

1. प्रातः स्नान

एकादशी के दिन प्रातः जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें।

2. व्रत का संकल्प

भगवान विष्णु के सामने बैठकर श्रद्धापूर्वक एकादशी व्रत का संकल्प लें।

अपनी क्षमता के अनुसार व्रत का प्रकार निर्धारित करें।

3. भगवान विष्णु की पूजा

भगवान विष्णु या श्रीहरि की प्रतिमा अथवा चित्र के सामने दीपक जलाएँ।

फूल, तुलसी दल, फल और अन्य सात्त्विक सामग्री अर्पित करें।

4. विष्णु मंत्र का जाप

भगवान विष्णु के नाम का स्मरण करें।

उदाहरण के लिए—

“ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।”

इस मंत्र का जाप श्रद्धा के साथ किया जा सकता है।

5. एकादशी कथा का श्रवण

पुत्रदा एकादशी की कथा पढ़ें या सुनें।

कथा का मूल संदेश केवल संतान प्राप्ति नहीं, बल्कि कर्म, करुणा, धर्म और प्रायश्चित को समझना भी है।

6. रात्रि जागरण

परंपरा में एकादशी की रात्रि में भगवान विष्णु का भजन, कीर्तन और स्मरण करते हुए जागरण का विधान बताया गया है।

हालाँकि अपनी शारीरिक क्षमता और स्वास्थ्य के अनुसार ही जागरण करना चाहिए।

7. द्वादशी को पारण

अगले दिन द्वादशी तिथि में उचित समय देखकर व्रत का पारण किया जाता है।

पारण का समय स्थानीय पंचांग के अनुसार निर्धारित करना चाहिए।


पुत्रदा एकादशी में क्या खाएँ?

व्रत की परंपरा व्यक्ति और संप्रदाय के अनुसार अलग-अलग हो सकती है।

जो लोग निर्जल व्रत करते हैं, वे पूरे दिन जल और भोजन ग्रहण नहीं करते। लेकिन ऐसा व्रत हर व्यक्ति के लिए उपयुक्त नहीं होता।

जो लोग फलाहार करते हैं, वे सामान्यतः व्रत में स्वीकार्य खाद्य पदार्थ लेते हैं, जैसे—

  • फल
  • दूध
  • दही
  • मखाना
  • सिंघाड़े का आटा
  • कुट्टू का आटा
  • साबूदाना
  • सेंधा नमक
  • सूखे मेवे

व्रत के नियम अपने परिवार की परंपरा और संबंधित धार्मिक संप्रदाय के अनुसार अपनाए जा सकते हैं।


एकादशी में किन चीजों से बचना चाहिए?

धार्मिक परंपरा में एकादशी के दिन अनाज और कुछ अन्य खाद्य पदार्थों का सेवन न करने की मान्यता है।

आम तौर पर व्रत रखने वाले लोग—

  • चावल
  • गेहूँ
  • सामान्य अनाज
  • दालें
  • मांसाहार
  • शराब
  • तंबाकू

से परहेज करते हैं।

इसके अलावा एकादशी को केवल भोजन का संयम न मानकर वाणी, विचार और व्यवहार का संयम भी माना गया है।


क्या पुत्रदा एकादशी केवल पुत्र प्राप्ति के लिए है?

यह प्रश्न आधुनिक समय में विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।

‘पुत्रदा’ नाम के कारण इसे केवल पुत्र प्राप्ति से जोड़ना संकीर्ण अर्थ होगा। धार्मिक परंपरा के संदर्भ में इसे संतान प्राप्ति और संतान सुख की कामना से जुड़ा व्रत माना जा सकता है।

आज के समय में इसे इस भाव से समझना अधिक सार्थक है कि माता-पिता अपने परिवार में स्वस्थ, संस्कारी और सुखी संतान की कामना करते हैं।

धर्म का मूल संदेश संतान के लिंग से अधिक संतान के कल्याण और परिवार की सुख-समृद्धि से जुड़ा होना चाहिए।


पुत्रदा एकादशी और कर्म का संदेश

इस कथा का सबसे गहरा संदेश राजा महीजित की संतानहीनता नहीं, बल्कि उसका कर्म और प्रायश्चित है।

राजा अपने वर्तमान जीवन में धर्मात्मा था। फिर भी कथा उसके पूर्व जन्म के कर्म को उसके वर्तमान जीवन के अनुभव से जोड़ती है।

यह हिंदू दर्शन में वर्णित कर्म सिद्धांत की ओर संकेत करता है।

मनुष्य को अपने प्रत्येक कर्म के प्रति सजग रहना चाहिए।

विशेष रूप से—

किसी प्यासे जीव को पानी से वंचित न करना, किसी भूखे को भोजन से रोकना और किसी कमजोर प्राणी के प्रति क्रूर व्यवहार न करना—यह कथा करुणा का अत्यंत सुंदर संदेश देती है।

एक प्यासी गाय को पानी पीने से रोकने जैसी छोटी प्रतीत होने वाली घटना भी कथा में गंभीर कर्मफल से जोड़ी गई है।


पुत्रदा एकादशी का आध्यात्मिक संदेश

पुत्रदा एकादशी की कथा को केवल एक इच्छा-पूर्ति की कहानी मानना इसके गहरे संदेश को सीमित कर देता है।

इस कथा में कई महत्वपूर्ण आध्यात्मिक शिक्षाएँ छिपी हैं।

करुणा

हर जीव के प्रति दया रखना धर्म का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

कर्म की जिम्मेदारी

मनुष्य को अपने कर्मों के परिणाम के प्रति सजग रहना चाहिए।

प्रायश्चित

यदि कोई गलती हो जाए तो उसे स्वीकार करके सुधार का प्रयास करना चाहिए।

संयम

एकादशी का व्रत इंद्रियों पर नियंत्रण और आत्म-अनुशासन की साधना के रूप में भी देखा जाता है।

परोपकार

राजा के दुःख को देखकर पूरी प्रजा उसके लिए व्रत करती है। यह सामूहिक प्रार्थना और परोपकार की भावना को दर्शाता है।

भक्ति

कथा का अंतिम आधार भगवान विष्णु की भक्ति और उनके प्रति श्रद्धा है।


क्या पुत्रदा एकादशी से संतान प्राप्ति निश्चित होती है?

धार्मिक दृष्टि से इस व्रत को संतान सुख प्रदान करने वाला माना गया है, लेकिन इसे संतान प्राप्ति की निश्चित या वैज्ञानिक गारंटी नहीं कहा जा सकता।

संतान प्राप्ति जैविक, स्वास्थ्य संबंधी और अनेक अन्य कारकों पर निर्भर करती है।

इसलिए यदि किसी दंपति को गर्भधारण में कठिनाई हो रही है, तो धार्मिक आस्था के साथ-साथ योग्य स्त्रीरोग विशेषज्ञ या प्रजनन विशेषज्ञ से चिकित्सकीय सलाह लेना भी आवश्यक है।

व्रत और प्रार्थना आध्यात्मिक सहारा दे सकते हैं, लेकिन उन्हें चिकित्सा का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए।


पुत्रदा एकादशी पर क्या करें?

इस दिन धार्मिक रूप से निम्न कार्य किए जा सकते हैं—

  1. प्रातः स्नान करके व्रत का संकल्प लें।
  2. भगवान विष्णु की पूजा करें।
  3. तुलसी दल अर्पित करें।
  4. “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” का जाप करें।
  5. पुत्रदा एकादशी की कथा पढ़ें या सुनें।
  6. जरूरतमंद व्यक्ति की सहायता करें।
  7. गौ, पक्षी और अन्य जीवों के प्रति करुणा रखें।
  8. क्रोध, झूठ और कटु वाणी से बचें।
  9. संभव हो तो रात्रि में भजन-कीर्तन करें।
  10. द्वादशी को उचित समय पर पारण करें।

पुत्रदा एकादशी का सबसे सुंदर संदेश

राजा महीजित की कथा हमें बताती है कि धर्म केवल मंदिर में पूजा करने का नाम नहीं है।

यदि हम भगवान की पूजा करते हैं लेकिन किसी प्यासे जीव को पानी नहीं देते, किसी भूखे व्यक्ति को भोजन नहीं देते या किसी कमजोर प्राणी के साथ अन्याय करते हैं, तो हमारी धार्मिक साधना अधूरी रह जाती है।

एकादशी हमें केवल भोजन का त्याग नहीं सिखाती, बल्कि अहंकार, क्रोध, लोभ और बुरे विचारों पर नियंत्रण का भी संदेश देती है।

पुत्रदा एकादशी की कथा में राजा को संतान सुख की प्राप्ति होती है, लेकिन उससे भी बड़ा संदेश यह है कि मनुष्य को अपने कर्मों के प्रति जागरूक होकर दया, धर्म और परोपकार का मार्ग अपनाना चाहिए।


निष्कर्ष

श्रावण शुक्ल पुत्रदा एकादशी भगवान विष्णु की भक्ति, व्रत, संयम और संतान सुख की धार्मिक कामना से जुड़ी महत्वपूर्ण एकादशी है।

राजा महीजित और लोमश ऋषि की कथा हमें यह संदेश देती है कि मनुष्य के जीवन में कर्म, करुणा और प्रायश्चित का विशेष महत्व है।

धार्मिक मान्यता के अनुसार पुत्रदा एकादशी का व्रत करने से संतान सुख, परिवार की समृद्धि और भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है। वहीं आध्यात्मिक दृष्टि से यह व्रत हमें अपने जीवन में संयम, सेवा, दया और सदाचार अपनाने की प्रेरणा देता है।

इसलिए पुत्रदा एकादशी को केवल “संतान प्राप्ति का व्रत” न मानकर धर्म, कर्म और करुणा की साधना के रूप में समझना अधिक सार्थक है।

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
श्रीहरि विष्णु की कृपा सभी पर बनी रहे। 🙏


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