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शुक्रवार, 08 मई 2026

श्री कार्तिकेय (मुरुगन/स्कंद) चालीसा (Kartikeya Chalisa)

श्री कार्तिकेय (मुरुगन/स्कंद) चालीसा (Kartikeya Chalisa)

श्री कार्तिकेय (मुरुगन/स्कंद) चालीसा (Kartikeya Chalisa)

62 Visited Chalisa Collection • Updated: Sunday, 24 August 2025

श्री कार्तिकेय (मुरुगन/स्कंद) चालीसा (Kartikeya Chalisa)


श्री कार्तिकेय (मुरुगन/स्कंद) चालीसा (Kartikeya Chalisa)

भगवान कार्तिकेय भगवान शिव और पार्वती के पुत्र हैं और उन्हें युद्ध के देवता के रूप में पूजा जाता है।

श्री कार्तिकेय चालीसा का पाठ करने से भक्तों को भगवान कार्तिकेय के प्रति अपनी भक्ति व्यक्त करने और उनके आशीर्वाद प्राप्त करने का अवसर मिलता है। यह चालीसा जीवन में साहस, शक्ति और विजय की प्राप्ति में मदद करती है।

श्री कार्तिकेय चालीसा में भगवान कार्तिकेय की विभिन्न विशेषताओं और उनके महत्व का वर्णन किया गया है, जैसे कि उनकी शक्ति, साहस और ज्ञान। इसमें उनकी भूमिका को असुरों के विनाश और धर्म की रक्षा में भी बताया गया है।

भगवान कार्तिकेय की पूजा और आराधना करने से भक्तों को साहस, शक्ति और विजय की प्राप्ति होती है। श्री कार्तिकेय चालीसा का पाठ करने से भक्तों को भगवान कार्तिकेय की कृपा और आशीर्वाद प्राप्त करने में मदद मिलती है।


दोहा:

श्री गणेशाय नमः। जय जय जय कार्तिकेय, शंकर-सुवन कृपाल।
शिवदत्तं सुत तेहि, तात मेटहु सब विकार।।

(अर्थ: गणेश जी को नमन करते हुए कार्तिकेय की जय हो। शिव पुत्र कार्तिकेय, जो शिव द्वारा दिए गए वरदान हैं, हमारे सभी दोषों को मिटा दें।)

श्लोक १ से ८ तक कार्तिकेय चालीसा और उसका अर्थ

जय जय श्री कार्तिकेय स्वामी।
जय शिवसुत, भक्त सुखधामी॥1

(अर्थ: भगवान कार्तिकेय की जय हो, जो शिव के पुत्र और भक्तों के सुखदाता हैं।)

महिमा अपार आपकी गाई।
संतन को शक्ति प्रभु पाई॥2

(अर्थ: आपकी महिमा का कोई अंत नहीं है, प्रभु। संतों ने आपसे शक्ति प्राप्त की है।)

शिव शिवा तनय बालक प्यारे।
कार्तिकेय सुखधाम हमारे॥3

(अर्थ: आप शिव और पार्वती के प्रिय पुत्र हैं, और हमारे सुख के धाम हैं।)

ध्वजा धारण कर दुर्जन मारो।
भक्तों का दुख हरन निवारो॥4

(अर्थ: आप ध्वजा धारण कर दुष्टों का नाश करते हैं और भक्तों के दुखों का हरण करते हैं।)

गजमुख दैत संहारक तुम्ह हो।
तारकासुर विदारक तुम्ह हो॥5

(अर्थ: आप गजमुख नामक दैत्य के संहारक हैं और तारकासुर का भी वध करने वाले हैं।)

मोदक प्रिय, मन भायो भोजन।
कुमुद पाठ प्रिय, भव रंजन॥6

(अर्थ: आप मोदक को प्रिय मानते हैं और कुमुद पुष्प का सेवन पसंद करते हैं, जो संसार को आनंदित करता है।)

सिंह वाहिनी, ध्वजा तुम धारी।
दुष्टों का दल करहो संहारी॥7

(अर्थ: आप सिंह पर सवार हैं और ध्वजा धारण करते हैं, आप दुष्टों का समूह संहारते हैं।)

शिव के सुत तुम, शक्ति के धाम।
जय कार्तिकेय, जय जय नाम॥8

(अर्थ: आप शिव के पुत्र और शक्ति के धाम हैं। कार्तिकेय की जय हो, आपका नाम सदा विजयी हो।)

श्लोक ९ से १८ तक कार्तिकेय चालीसा और उसका अर्थ

सुमुख नंदन, तारक भ्राता।
शिव समान सदा सुजाता॥9

(अर्थ: आप गणेश के भाई और तारक के भाई हैं। आप शिव के समान महान हैं।)

मातु पार्वती तव नाम पुकारे।
पुत्र सखा सबहि उबारें॥10

(अर्थ: माता पार्वती ने आपका नाम पुकारा, और आप सबको उबारने वाले हैं।)

शक्ति रूप हो, विनायक भ्राता।
शिव-शिवा के, कुल के गाता॥11

(अर्थ: आप शक्ति के रूप हैं और गणेश के भाई हैं। आप शिव और पार्वती के कुल के रक्षक हैं।)

पार्वती के पुत्र प्यारे।
तारकासुर विदारक न्यारे॥12

(अर्थ: आप पार्वती के प्यारे पुत्र और तारकासुर का वध करने वाले हैं।)

भक्तों के तुम बिपत्ति हरो।
जय जय जय कार्तिकेय करो॥13

(अर्थ: आप भक्तों की विपत्ति को दूर करते हैं। जय जय जय कार्तिकेय।)

गणपति के प्रिय, तारक नंदन।
शिव शिवा के लाड़ले बंदन॥14

(अर्थ: आप गणपति के प्रिय और तारक के पुत्र हैं। शिव और पार्वती के लाड़ले, आपको वंदन है।)

तारकासुर का संहारक तुम हो।
दुष्टों का दल हारक तुम हो॥15

(अर्थ: आप तारकासुर का संहारक और दुष्टों के दल को हराने वाले हैं।)

करहु कृपा हम पर प्रभु प्यारे।
सकल दुखों को हरनवारे॥16

(अर्थ: हे प्रभु, हम पर कृपा करें और हमारे सभी दुखों को दूर करें।)

जय जय श्री कार्तिकेय भगवान।
सदा सुखधाम, सब दुख निधान॥17

(अर्थ: भगवान कार्तिकेय की जय हो, जो सदैव सुख के धाम हैं और सभी दुखों का नाश करने वाले हैं।)

दोहा:

शरणागत जन नाथ तुहि, सेवक सेवक दास।
करुणा करि रक्षा करो, श्री कार्तिकेय त्रिनाथ।।18

(अर्थ: हे नाथ, जो आपके शरण में आते हैं, आप उनके रक्षक हैं। कृपा कर, हमारे ऊपर करुणा करें, हे श्री कार्तिकेय।)


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