जीवित्पुत्रिका (जिउतिया) व्रत कथा: संतान की दीर्घायु और अटूट मातृ-प्रेम का पावन पर्व
43 Visited Festival • Updated: Saturday, 03 October 2026

हिंदू धर्म में माताओं द्वारा संतानों के कल्याण, आरोग्य और दीर्घायु के लिए रखे जाने वाले व्रतों में जीवित्पुत्रिका (जिउतिया) व्रत का स्थान अत्यंत विशिष्ट माना जाता है। आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाने वाला यह निर्जला व्रत मातृ-स्नेह, त्याग और अटूट आस्था का प्रतीक है।
यहाँ प्रस्तुत है जीवित्पुत्रिका व्रत की संपूर्ण पौराणिक कथा, इसका इतिहास और इसके पीछे का गहरा आध्यात्मिक संदेश।
कथा का आरम्भ: ऋषियों की चिंता और द्रौपदी का विलाप
कथा का सूत्रपात नैमिषारण्य तीर्थ से होता है। वहाँ एकत्र महर्षियों ने सूत जी से प्रश्न किया—
"हे सूत जी! इस दारुण कलियुग में संतानों की अकाल मृत्यु से रक्षा और उनकी दीर्घायु का क्या साधन है?"
सूत जी ने बताया कि द्वापर युग के अंत में जब माताओं के जीवित रहते हुए उनके पुत्र काल-कवलित होने लगे, तब व्याकुल स्त्रियाँ समाधान हेतु महर्षि गौतम के आश्रम पहुँचीं।
महर्षि गौतम ने उन्हें वह कथा सुनाई जो महाभारत युद्ध के पश्चात महर्षि धौम्य ने द्रौपदी को सुनाई थी। युद्ध की समाप्ति पर अश्वत्थामा ने सोते हुए पांडव पुत्रों का निर्मम वध कर दिया था। अपने समस्त पुत्रों को खो चुकी शोकमग्न द्रौपदी ने धौम्य ऋषि के चरणों में गिरकर पुत्रों को दीर्घायु प्रदान करने वाले उपाय की याचना की थी। तब धौम्य ऋषि ने उन्हें सतयुग के धर्मात्मा राजा जीमूतवाहन की कथा सुनाई।
राजा जीमूतवाहन का अप्रतिम आत्मोत्सर्ग
सतयुग में सूर्यवंश के राजा शालिवाहन और रानी शैव्या के पुत्र जीमूतवाहन बड़े ही दयालु, सत्यनिष्ठ और परोपकारी शासक थे। एक बार वे अपने ससुराल में निवास कर रहे थे। आधी रात को सहसा उन्हें एक वृद्धा स्त्री के करुण क्रंदन की ध्वनि सुनाई दी:
"हाय! मुझ बूढ़ी माँ के सामने मेरा जवान बेटा मुझसे छिनने जा रहा है..."
राजा तुरंत उस वृद्धा के पास पहुँचे और कारण पूछा। वृद्धा ने आँसू बहाते हुए कहा:
"हे राजन! पक्षीराज गरुड़ का प्रतिदिन एक सर्प (जीव) का आहार करने का नियम है। आज वध्य-शिला पर जाने की बारी मेरे इकलौते पुत्र की है।"
वृद्धा की ममता देखकर राजा का हृदय पिघल गया। उन्होंने कहा, "माँ! तुम निश्चिंत रहो, तुम्हारे पुत्र के प्राणों की रक्षा मैं करूँगा।"
राजा बिना किसी भय के स्वयं वध्य-शिला पर लेट गए। नियत समय पर महाबली गरुड़ आए और उन्होंने शिला पर लेटे राजा के शरीर के बाँए हिस्से का माँस खाना आरंभ किया। राजा ने पीड़ा की एक आह तक नहीं भरी, बल्कि मुस्कुराते हुए अपना दाहिना भाग भी गरुड़ की ओर मोड़ दिया।
राजा के इस अलौकिक त्याग और धैर्य को देखकर गरुड़ स्तब्ध रह गए। उन्होंने तुरंत खाना बंद कर दिया और पूछा—
"हे वीर! आप साधारण मनुष्य नहीं हो सकते। कृपया अपना सत्य परिचय दें।"
राजा जीमूतवाहन ने अपना परिचय दिया। उनकी निर्लोभ दयालुता से अभिभूत होकर गरुड़ ने उनसे मनचाहा वरदान मांगने को कहा।
राजा जीमूतवाहन के दो वरदान:
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पहला वरदान: गरुड़ द्वारा पूर्व में भक्षण किए गए सभी मृत प्राणी पुनः जीवित हो उठें।
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दूसरा वरदान: भविष्य में गरुड़ किसी भी निरपराध जीव की बलि न लें और संसार की संतानें दीर्घायु हों।
गरुड़ ने प्रसन्न होकर अमृत की वर्षा की, जिससे समस्त कंकाल और मृत शरीर पुनः जीवित हो गए। राजा का क्षत-विक्षत शरीर पहले से भी दोगुना दिव्य और कांतिमान हो गया।
इसके उपरांत गरुड़ ने स्वयं लोककल्याण हेतु आशीर्वाद दिया:
"आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को जो स्त्रियाँ कुश से राजा जीमूतवाहन की प्रतिमा बनाकर 'जीवत्पुत्रिका' (भगवती दुर्गा स्वरूप) का पूजन और निर्जला व्रत करेंगी, उनकी संतानें अकाल मृत्यु से सुरक्षित रहेंगी और कुल में सदा ऐश्वर्य की वृद्धि होगी।"
चिल्ही (चील) और सियारिन (शिवा) की कथा
धौम्य ऋषि के वचनों को सुनकर द्रौपदी ने नगर की नारियों के साथ यह व्रत आरंभ किया। आगे चलकर इस व्रत की शक्ति एक दृष्टांत से और स्पष्ट हुई:
एक वन में पीपल (प्लक्ष) के विशाल वृक्ष की डाल पर एक चिल्ही (चील) रहती थी और उसी वृक्ष के खोह (कोटर) में उसकी सखी सियारिन (शिवा) का बसेरा था। एक दिन दोनों ने एक विद्वान ब्राह्मण के मुख से जीवित्पुत्रिका व्रत की महिमा सुनी और दोनों ने संकल्प लेकर यह व्रत रखा।
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चिल्ही का संकल्प: चिल्ही ने कठोर संयम रखा और पूरे दिन-रात निराहार व निर्जल रहकर व्रत का पालन किया।
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सियारिन का विचलन: दूसरी ओर, सियारिन भूख की ज्वाला सहन न कर सकी। आधी रात को जब भूख असह्य हो गई, तो वह चुपके से श्मशान पहुँची और वहाँ शव-मांस खाकर अपनी क्षुधा शांत की। इस प्रकार उसका व्रत खंडित हो गया।
अगले दिन नवमी तिथि को चिल्ही ने गौशाला में जाकर पवित्र जल से विधिवत पारण किया।
अगला जन्म और कर्मफल की अनिवार्यता
समय बीतने पर दोनों की मृत्यु हुई। अपने-अपने प्रारब्ध के अनुसार, दोनों का पुनर्जन्म कोशलपुर के एक धनी श्रेष्ठि के घर दो सगी बहनों के रूप में हुआ:
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पूर्व जन्म की सियारिन बड़ी बहन बनी, जिसका विवाह काशीराज से हुआ और वह महारानी बनी।
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पूर्व जन्म की चिल्ही छोटी बहन बनी, जिसका विवाह राजा के बुद्धिमान मंत्री से हुआ।
विपरीत भाग्य और ईर्ष्या का विष
छोटी बहन (मंत्री की पत्नी) को अपने पूर्व जन्म का पूरा स्मरण (जातिस्मरा) था। उसने आठ सुंदर, स्वस्थ और गुणवान पुत्रों को जन्म दिया।
इसके विपरीत, बड़ी बहन (रानी) के गर्भ से जो भी बालक जन्म लेता, वह जन्म लेते ही या अल्पायु में ही मृत्यु को प्राप्त हो जाता।
रानी अपनी बहन के आठों पुत्रों को देखकर ईर्ष्या की आग में जलने लगी। उसने राजा को विवश कर अपनी ही बहन के पुत्रों का सिर कटवा दिया और कटे हुए सिरों को बाँस की टोकरियों (दौरी) में ढककर छोटी बहन के घर भिजवा दिया।
परंतु, जीवत्पुत्रिका व्रत के अचूक प्रभाव से वे कटे हुए सिर बहुमूल्य रत्नों में परिवर्तित हो गए और सभी आठों बालक सकुशल, जीवित और अक्षत शरीर के साथ घर लौट आए।
पश्चाताप और मुक्ति
जब रानी ने देखा कि उसकी बहन के पुत्र अभी भी जीवित और आनंदित हैं, तो वह हतप्रभ रह गई। वह सीधे अपनी छोटी बहन के पास पहुँची और विलाप करते हुए पूछा—
"बहन! तुमने ऐसा कौन सा पुण्य किया है कि तुम्हारे बालक मृत्यु के मुख से भी बार-बार लौट आते हैं, जबकि मेरी गोद सदैव सूनी रह जाती है?"
तब मंत्री-पत्नी ने स्नेहपूर्वक रहस्य उजागर किया:
"हे दीदी! पूर्व जन्म में तुम सियारिन थीं और मैं चील। हम दोनों ने साथ में जीवित्पुत्रिका का व्रत लिया था, किंतु भूख के वशीभूत होकर तुमने श्मशान में मांस खाकर व्रत खंडित कर दिया था। उसी खंडित व्रत के दोष से तुम्हारी संतानें जीवित नहीं रहतीं। मैंने पूर्ण निष्ठा से निर्जला व्रत निभाया था, जिसके पुण्य से मेरे पुत्रों का बाल भी बांका नहीं हो सकता।"
रानी को अपनी भूल का गहरा पश्चाताप हुआ। छोटी बहन की प्रेरणा से उसने विधि-विधान, शुद्ध मन और अटूट श्रद्धा के साथ जीवित्पुत्रिका का निर्जला व्रत आरंभ किया। भगवती दुर्गा और राजा जीमूतवाहन की कृपा से उसके सभी दोष नष्ट हुए और उसे दीर्घायु पुत्रों की प्राप्ति हुई, जो आगे चलकर प्रतापी राजा बने।
निष्कर्ष: पर्व का आध्यात्मिक संदेश
जीवित्पुत्रिका व्रत मात्र एक कर्मकांड नहीं, बल्कि यह सिखाता है कि:
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संकल्प की दृढ़ता: व्रत में मन, वाणी और कर्म की शुद्धि अनिवार्य है।
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त्याग और परोपकार: राजा जीमूतवाहन का जीवन संदेश देता है कि दूसरों के प्राणों की रक्षा के लिए किया गया आत्मोत्सर्ग कभी व्यर्थ नहीं जाता।
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मातृ-शक्ति: माँ की सच्ची तपस्या और निष्ठा संतान के लिए सबसे बड़ा रक्षा-कवच बनती है।
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